भाग-III : मूल अधिकार (Fundamental Rights)

मूल अधिकार (Fundamental Rights)

• मौलिक अधिकार भारतीय संविधान में निहित वे मूलभूत अधिकार हैं जो भारत के प्रत्येक नागरिक को प्रदान किए गए हैं। ये अधिकार किसी भी व्यक्ति के भौतिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अपरिहार्य हैं।
• मौलिक अधिकारों का वर्णन भारतीय संविधान के भाग III में अनुच्छेद 12 से 35 तक किया गया है। इस प्रावधान को अमेरिका के संविधान से लिया गया है।
• मौलिक अधिकार न्यायसंगत (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) या उच्च न्यायालय (High Court) का रुख कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 32 के तहत और उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत रिट (Writs) जारी कर सकते हैं।
• मौलिक अधिकार निरपेक्ष (Absolute) नहीं हैं। वे युक्तियुक्त प्रतिबंधों (Reasonable Restrictions) के अधीन हैं, जिनका अर्थ है कि राज्य सार्वजनिक हित, सुरक्षा या नैतिकता के आधार पर उन पर कुछ सीमाएं लगा सकता है।

मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)

• मूल संविधान में सात मौलिक अधिकार थे, लेकिन 44वें संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा संपत्ति के अधिकार (अनुच्छेद 31) को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया और इसे भाग-XII के अनुच्छेद 300A के तहत एक कानूनी (विधिक) अधिकार बना दिया गया। वर्तमान में, भारतीय नागरिकों को छह मौलिक अधिकार प्राप्त हैं।

अनुच्छेद 12 :- इस अनुच्छेद में मौलिक अधिकार के संदर्भ में राज्य को परिभाषित (Definition of State) किया गया है।
अनुच्छेद 13 (1) :- यह अनुच्छेद घोषणा करता है कि संविधान के लागू होने से पहले के सभी कानून, जो मौलिक अधिकारों के असंगत हैं, उस असंगति की सीमा तक शून्य (Void) होंगे।
अनुच्छेद 13 (2) :- यह अनुच्छेद कहता है कि राज्य कोई ऐसा कानून नहीं बनाएगा जो मौलिक अधिकारों को छीनता हो या कम करता हो, और ऐसा कोई भी कानून बनाने पर वह उस सीमा तक शून्य होगा।

पृथक्करण का सिद्धांत (Doctrine of Severability) :- भारतीय संवैधानिक कानून का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो न्यायपालिका को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह किसी अधिनियम के केवल असंवैधानिक भाग को हटा दे, और यदि शेष भाग वैध रूप से लागू होने योग्य हो, तो उसे बनाए रखे। इसे “विभेदन का सिद्धांत” भी कहा जाता है। इस सिद्धांत का आधार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 13 है।

1. समानता का अधिकार (Right to Equality) (अनुच्छेद 14-18)

अनुच्छेद 14 :- विधि के समक्ष समानता (Equality before law) अर्थात् कानून के सामने सब समान है। यह नाकारात्मक संदर्भ को बताता है। यह व्यवस्था ब्रिटेन से ली गई है। जबकि विधियों के समान संरक्षण (Equal protection of laws) की व्यवस्था अमेरिका से ली गई है। यह सकारात्मक संदर्भ को बताता है।

अपवाद :- राष्ट्रपति तथा राज्यपाल पर फौजदारी मुकदमा तथा गिरफ्तारी तब तक नहीं किया जा सकता जबतक कि वे अपने पद पर हो।

अनुच्छेद 15 :- धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी से भी भेदभाव नहीं किया जाएगा। जैसे सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों, कुओं, तालाबों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश।

• यह अनुच्छेद राज्य को निम्नलिखित के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है –
i) महिलाएँ और बच्चे।
ii) सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग (OBCs)।
iii) अनुसूचित जाति (SCs) और अनुसूचित जनजाति (STs)।

अनुच्छेद 16 :- लोक नियोजन में अवसर की समानता। यह अनुच्छेद सरकारी नौकरियों के संबंध में सभी नागरिकों को समान अवसर प्रदान करता है। इसमें पिछड़े वर्गों के लिए कुछ आरक्षण की चर्चा है।

अनुच्छेद 17 :- यह अनुच्छेद अस्पृश्यता (Untouchability) या छुआ-छूत को समाप्त करता है और किसी भी रूप में इसके अभ्यास को प्रतिबंधित करता है।

• इस अधिकार को लागू करने के लिए संसद ने अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 और बाद में नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1976 बनाया।

अनुच्छेद 18 :- यह अनुच्छेद राज्य को सैन्य या शैक्षणिक विशिष्टता को छोड़कर, कोई भी उपाधि प्रदान करने से प्रतिबंधित करता है।

• भारत का कोई भी नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा। विदेशों से प्राप्त उपाधि रखने के लिए राष्ट्रपति से अनुमति लेनी पड़ती है।
• भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री जैसे राष्ट्रीय पुरस्कार अनुच्छेद 18 का उल्लंघन नहीं करते हैं क्योंकि ये उपाधियाँ नहीं हैं, बल्कि ये कार्य के लिए दिए गए सम्मान हैं।

2. स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom) (अनुच्छेद 19-22)

अनुच्छेद 19 :- व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार। यह अनुच्छेद निम्न स्वतंत्रताओं की सुरक्षा करता है –
i) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (प्रेस की स्वतंत्रता)
ii) शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्रित होने की स्वतंत्रता
iii) संघ या संगठन बनाने की स्वतंत्रता
iv) भारत के पूरे क्षेत्र में घूमने की स्वतंत्रता
v) भारत के किसी भी हिस्से में निवास करने की स्वतंत्रता
vi) कोई भी पेशा अपनाने की स्वतंत्रता

अनुच्छेद 20 :- यह अनुच्छेद उन व्यक्तियों को संरक्षण प्रदान करता है जिन पर कोई अपराध करने का आरोप लगाया गया है। यह राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 359) के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता है।

• अनुच्छेद 20 में तीन तरह के संरक्षण शामिल हैं –
i) कार्योत्तर विधि से संरक्षण (No Ex-post-facto Law) (अनुच्छेद 20(1)) :- कोई भी व्यक्ति केवल तभी दोषी ठहराया जाएगा जब उसने ऐसा कार्य किया हो जो कृत्य करते समय (जिस दिन अपराध किया गया) प्रचलित कानून का उल्लंघन करता हो।
ii) दोहरे दंड से संरक्षण (No Double Jeopardy) (अनुच्छेद 20(2)) :- किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जाएगा।
iii) स्व-अभिशंसन से संरक्षण (No Self-incrimination) (अनुच्छेद 20(3)) :- किसी भी व्यक्ति पर जिसे अपराध का अभियुक्त बनाया गया है, स्वयं अपने विरुद्ध गवाह बनने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।

NOTE :- अनुच्छेद 20 के अनुसार जब तक किसी व्यक्ति को न्यायालय दोषी करार नहीं कर देती है तब तक उसे अपराधी नहीं माना जाता है।

अनुच्छेद 21 :- जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण (इसमें गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार शामिल है)।

• जीवन के अधिकार में निम्नलिखित शामिल हैं –
i) गरिमा के साथ जीने का अधिकार (Right to live with human dignity)
ii) आजीविका का अधिकार (Right to livelihood) :- (ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम, 1985)।
iii) स्वास्थ्य का अधिकार (Right to health)
iv) पर्यावरण का अधिकार (Right to environment) :- इसमें प्रदूषण मुक्त जल और वायु का अधिकार शामिल है।
v) निजता का अधिकार (Right to Privacy): (पुट्टस्वामी मामला, 2017) ने इसे मौलिक अधिकार घोषित किया।
vi) विदेशी यात्रा का अधिकार (Right to go abroad) :- (मेनका गांधी बनाम भारत संघ, 1978)।
vii) त्वरित सुनवाई का अधिकार (Right to speedy trial)
viii) मुक्त कानूनी सहायता का अधिकार (Right to free legal aid)
ix) नींद का अधिकार (Right to sleep)

• दैहिक स्वतंत्रता (Personal Liberty) में निम्नलिखित शामिल हैं –
i) आने-जाने की स्वतंत्रता।
ii) अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार।
iii) किसी भी व्यक्ति के शरीर पर स्वयं का नियंत्रण रखने का अधिकार।

अनुच्छेद 21A :- राज्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा। इस प्रावधान को 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संविधान में जोड़ा गया है।

अनुच्छेद 22 :- यह अनुच्छेद किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी और निरोध (Detention) की स्थिति में उसे सुरक्षा प्रदान करता है।

• यह अनुच्छेद किसी व्यक्ति को निम्न सुरक्षा प्रदान करता है –
i) गिरफ्तारी का कारण (वारंट) जानने का अधिकार होगा।
ii) गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर, गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए।
iii) गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से परामर्श करने और बचाव करने का अधिकार होगा।

निवारक निरोध अधिनियम (Preventive Detention Acts)

यह उन कानूनों को संदर्भित करते हैं जो राज्य को किसी व्यक्ति को किसी भी अपराध को करने से रोकने के उद्देश्य से, बिना किसी मुकदमे के, हिरासत में लेने की अनुमति देते हैं। यह प्रावधान करता है कि किसी भी व्यक्ति को तीन महीने से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता, जब तक कि एक सलाहकार बोर्ड (Advisory Board), जिसमें उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या न्यायाधीश बनने के योग्य व्यक्ति शामिल हों, यह रिपोर्ट न दे दे कि निरोध के लिए पर्याप्त कारण है।

नजरबंद :- जब किसी व्यक्ति को समाज से मिलने नहीं दिया जाता है तो उसे नजरबंद कहते हैं। नजरबंद होटल, आवास या जेल कहीं भी हो सकता है।

भारत में प्रमुख निवारक निरोध अधिनियम

• भारत की संसद ने समय-समय पर राष्ट्रीय सुरक्षा और लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए निवारक निरोध अधिनियम बनाए हैं। कुछ प्रमुख निम्नलिखित है –
i) निवारक निरोध अधिनियम (Preventive Detention Act – PDA) :- यह स्वतंत्र भारत का पहला निवारक निरोध कानून था जिसे 1950 में लाया गया था। इसे 1969 में समाप्त कर दिया गया।
ii) आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम (Maintenance of Internal Security Act – MISA) :- इसे 1971 में आंतरिक सुरक्षा और लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए बनाया गया था लेकिन इसका सर्वाधिक दुरूपयोग हुआ जिस कारण इसे 1978 में निरस्त कर दिया गया।
iii) विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी गतिविधि निवारण अधिनियम (Conservation of Foreign Exchange and Prevention of Smuggling Activities Act – COFEPOSA) :- इसे 1974 में विदेशी मुद्रा के संरक्षण और तस्करी गतिविधियों को रोकने के लिए लाया गया था। यह अभी तक लागू है।
iv) राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (National Security Act – NSA) :- इसे 1980 में भारत की सुरक्षा, विदेशी संबंधों, लोक व्यवस्था और आवश्यक सेवाओं के रखरखाव के लिए लाया गया था। यह भी अभी तक लागू है। यह वर्त्तमान में सबसे ख़तरनाक अधिनियम है। इसके तहत पुलिस इनकाउंटर कर देती है।
v) आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (Terrorist and Disruptive Activities (Prevention) Act – TADA) :- इसे 1985 में आतंकवाद से निपटने के लिए लाया गया था। इसे 1995 में निरस्त कर दिया गया।
vi) आतंकवाद निवारण अधिनियम (Prevention of Terrorism Act – POTA) :- इसे 2002 में आतंकवाद से संबंधित गतिविधियों को रोकने के लिए लाया गया था। इसे 2004 में निरस्त कर दिया गया।

NOTE :- गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (Unlawful Activities (Prevention) Act – UAPA) एक आतंकवाद विरोधी (Anti-Terrorism) कानून है। इसे 1967 में लाया गया था। यह भारत में गैरकानूनी गतिविधियों को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए बनाया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत की संप्रभुता और अखंडता के विरुद्ध निर्देशित गतिविधियों से निपटना है। यह निवारक निरोध में शामिल नहीं होता है।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right Against Exploitation) (अनुच्छेद 23-24)

अनुच्छेद 23 :- मानव दुर्व्यापार (Traffic in Human Beings) और बलात श्रम (बेगार) का निषेध।

• “मानव दुर्व्यापार” से तात्पर्य पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को वस्तु के रूप में खरीदना और बेचना, या उन्हें अनैतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करना है। इसमें वेश्यावृत्ति के लिए अनैतिक दुर्व्यापार भी शामिल है।
• “बलात श्रम” (Forced Labour) का अर्थ है किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध काम करने के लिए मजबूर करना।
• बेगार (Begar) का तात्पर्य ऐसे श्रम से है जो बिना पारिश्रमिक दिए लिया जाता है।
• इस प्रावधान को लागू करने के लिए संसद ने बंधुआ श्रम प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 पारित किया।

अपवाद :- यह अनुच्छेद राज्य को सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अनिवार्य सेवा (Compulsory Service) लागू करने की अनुमति देता है।

अनुच्छेद 24 :- यह प्रावधान करता है कि चौदह वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे को किसी कारखाने, खदान या किसी अन्य खतरनाक नियोजन (Hazardous Employment) में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा।

• इस प्रावधान को लागू करने के लिए संसद ने बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 और बाद में बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 पारित किया।

4. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion) (अनुच्छेद 25-28)

अनुच्छेद 25 :- यह अनुच्छेद सभी व्यक्तियों को निम्न स्वतंत्रता देता है –

i) अंतःकरण की स्वतंत्रता :- किसी भी देवी-देवता या धर्म से अपने आंतरिक संबंध को किसी भी रूप में मानने की आंतरिक स्वतंत्रता।
ii) मानने का अधिकार :- सार्वजनिक रूप से अपने धर्म में विश्वास की घोषणा करने का अधिकार।
iii) आचरण करने का अधिकार :- धार्मिक पूजा, कर्मकांड, प्रथाओं और अनुष्ठानों को प्रदर्शित करने का अधिकार (जैसे सिख धर्म में कृपाण धारण करना)।
iv) प्रचार करने का अधिकार :- अपने धर्म के सिद्धांतों को दूसरों तक पहुँचाने का अधिकार (लेकिन जबरन धर्मांतरण करने का अधिकार इसमें शामिल नहीं है)।

अनुच्छेद 26 :- यह अनुच्छेद प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय (Religious Denomination) को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।

अनुच्छेद 27 :- यह अनुच्छेद कहता है कि किसी विशेष धर्म के प्रचार के लिए दिया गया धन पर कर (Tax) नहीं लगेगा।

अनुच्छेद 28 :- यह अनुच्छेद कहता है कि राज्य निधि से पूर्णतः पोषित किसी भी शैक्षणिक संस्थान में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।

Note :- संस्कृत एक भाषा है न कि हिंदू धर्म की धार्मिक शिक्षा। इसी प्रकार उर्दू तथा अरबी एक भाषा है न कि इस्लाम धर्म की शिक्षा। अतः सरकारी मदरसा अनुच्छेद 28 का उल्लघंन नहीं है।

5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (Cultural and Educational Rights) (अनुच्छेद 29-30)

अनुच्छेद 29 :- यह अनुच्छेद कहता है कि भारत के नागरिकों के किसी भी वर्ग (केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं) को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार होगा।

Note :- भारत में अल्पसंख्यक का निर्धारण राष्ट्रीय स्तर पर किया जाता है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के तहत छह समुदायों (मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन) को अल्पसंख्यक अधिसूचित किया है। भारत में हिंदू बहुसंख्यक के अंतर्गत आते हैं। भारत में अल्पसंख्यक होने का आधार धार्मिक तथा भाषायी को माना जाता है।

• भारत में हिंदू समुदाय निम्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) में जनसंख्या के आधार पर अल्पसंख्यक है –
i) मिजोरम (ईसाई)
ii) नागालैंड (ईसाई)
iii) मेघालय (ईसाई)
iv) अरुणाचल प्रदेश (ईसाई और स्थानीय)
v) मणिपुर
vi) पंजाब (सिख)
vii) लक्षद्वीप (मुस्लिम)
viii) जम्मू और कश्मीर (मुस्लिम)
ix) लद्दाख (मुस्लिम व बौद्ध)

अनुच्छेद 30 :- यह अनुच्छेद अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार प्रदान करता है।

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies) (अनुच्छेद 32)

• यह सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने इसे “संविधान की आत्मा और हृदय” कहा था। यह अधिकार नागरिकों को यह सुनिश्चित करता है कि उनके अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर वे सीधे सर्वोच्च न्यायालय (SC) जा सकें।

भारतीय संविधान में रिट का प्रावधान

• रिट भारतीय संविधान में एक लिखित आदेश है जो सर्वोच्च न्यायालय (SC) या उच्च न्यायालय (HC) द्वारा जारी किया जाता है। यह मुख्य रूप से नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए और न्यायिक या प्रशासनिक कार्यों में हुई गलतियों को सुधारने के लिए प्रयोग किया जाता है।
i) सर्वोच्च न्यायालय (SC) अनुच्छेद 32 के तहत रिट जारी करता है। यह केवल मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए रिट जारी करता है। इसके द्वारा जारी रिट पूरे देश में मान्य होता है।
ii) उच्च न्यायालय (HC) अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करता है। उच्च न्यायालय, मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य कानूनी अधिकारों के लिए भी रिट जारी कर सकता है, इसलिए इसका रिट अधिकार क्षेत्र व्यापक है। इसके द्वारा जारी रिट संबंधित राज्य में ही मान्य होता है।

• भारतीय संविधान में मुख्य रूप से 5 प्रकार की रिट हैं –
1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) :- इसका शाब्दिक अर्थ “सशरीर पस्तुत करना” होता है। यह तब जारी की जाती है जब किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में लिया गया हो। न्यायालय हिरासत में लेने वाले अधिकारी को आदेश देता है कि वह व्यक्ति को न्यायालय के सामने पेश करे।
2. परमादेश (Mandamus) :- इसका शाब्दिक अर्थ “हम आदेश देते हैं” होता है। यह न्यायालय द्वारा किसी सार्वजनिक अधिकारी, निगम, या निचली अदालत को उनके कानूनी कर्तव्य का पालन करने के लिए जारी किया जाता है।
3. प्रतिषेध (Prohibition) :- इसका शाब्दिक अर्थ “रोकना” होता है। यह उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालतों या न्यायाधिकरणों को अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करने या उस मामले पर कार्यवाही करने से रोकने के लिए जारी किया जाता है, जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है।
4. उत्प्रेषण (Certiorari) :- इसका शाब्दिक अर्थ “सूचित करना” या “प्रमाणित होना” होता है। यह उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत या न्यायाधिकरण के किसी आदेश को रद्द करने के लिए जारी किया जाता है, या किसी मामले को अपने पास मँगवाने के लिए दिया जाता है, यदि निचली अदालत ने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया हो। इसे न्यायिक कार्यवाही का पोस्टमार्टम के रूप में जाना जाता है।
5. अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) :- इसका शाब्दिक अर्थ “किस अधिकार या वारंट से” होता है। यह न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति को यह पूछने के लिए जारी किया जाता है कि वह किस कानूनी अधिकार से किसी सार्वजनिक कार्यालय को धारण कर रहा है, ताकि उसके अवैध कब्ज़े को रोका जा सके। इसे भी पोस्टमार्टम के रूप में जाना जाता है।

अनुच्छेद 33 :- यह अनुच्छेद संसद को यह अधिकार देता है कि वह कानून बनाकर सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस बलों, खुफिया एजेंसियों और ऐसे ही अन्य बलों के सदस्यों को प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों को सीमित या समाप्त कर सकती है।

अनुच्छेद 34 :- यह अनुच्छेद संसद को यह शक्ति देता है कि वह किसी क्षेत्र में सेना का कानून (Martial Law) लागू होने के दौरान मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगा सकती है।

• AFSPA का पूरा नाम Armed Forces (Special Powers) Act, 1958 है। यह एक ऐसा कानून है जो भारतीय सेना और अन्य केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को “अशांत क्षेत्र” (Disturbed Area) घोषित किए गए क्षेत्रों में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुछ विशेष अधिकार और कानूनी छूट प्रदान करता है। इसे सबसे पहले 1958 में भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद से निपटने के लिए लागू किया गया था।

अनुच्छेद 35 :- यह अनुच्छेद स्पष्ट करता है कि भाग III (मौलिक अधिकार) के कुछ विशिष्ट प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने की शक्ति केवल संसद के पास होगी, न कि राज्य विधानमंडलों के पास।

– : समाप्त : –

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